धरम-करम

सेवा कइल सभसे बड़का धरम हऽ

आज जदी हमनी के अपना रहन सहन के ढंग निहारब त ई बात साफ हो जाई कि पहिले जइसन अब कुछुओ नइखे. अब हमनी के जीये के, खाये के आ सोचे के सभ तरीका बदल गइल बा. हर कमवे में दोसरा से जल्दी आगे निकले में तेजी आ गइल बा. एही सभ कारन से हमनी के अपना जिनिगी के मूलमंत्र भा धरमकरम सभ कुछ भोर पड़ल जाता.

ए घड़ी सभकरा खाली एके गो बात लउकत बा कि हाली से समाज में हमार मानमरजादा कइसहूँ बढ़ जाव. साँच पूछीं त ई लकम सामाजिक जीवन खातिर नीमन ना होला. अइसन भइला से मन में सेवा करेके भावना, नीमन बाउर सोचे के क्षमता सभ कुछ ओरा जाला. जे नीमन लक्षन ना ह. जदी समय रहते हमनी के ना चेतल जाई त उ दिन दूर नइखे जब लोग हमनी के पढ़ल लिखल भइला के बादो बुरबक बूझे लागी. तब हमनी के भगवान के दिहल बुद्धि के सही इस्तेमाल भलाई के काम करे खातिर ना कर पावल जाई.

तपजोगी पं० श्री राम शरमा आचार्य के कहनाम ह कि ओछ काम करेवालन के बारे में जदी जानकारी कइल जाव त इहे मालूम चली कि अइसन काम लोग ज्ञान के कमी के कारन करेला. जिनिगी के सेवा भाव से भरला में, नीमन सोंच के भइला में धन, पद आ परतिस्ठा के कउनो जोगदान ना होला. नीमन मन बनावे के रस्ता नीमन करम से बनेला. दोसरा के अच्छाई देखि के बढ़िया बने खातिर नियम बनल बा. अइसन बुद्धि जदी केहू के मिल जाय त ओकरा ई बूझे के चाही कि भगवान के ओकरा पर किरपा हो गइल बा. ज्ञान से लोगन मे अइसने बुद्धि जागेला. एही से ज्ञान भगवान के सभसे बढ़िया वरदान मानल गइल बा. अउर इहे ज्ञान के बढ़िया इस्तेमाल करि के आदमी जीवन के आदर्श आ सु्संस्कृत बनावे में भगवान के किरपा मानल जाला. जास्ती ज्ञान भइलो पर दोसरा के सेवा करे खातिर मन बेचैन रहेला.

मनुस्य के एगो समाजिक परानी भइला के कारन ओकर समाज के खातिर सेवा कइल धरम बनेला. ओकरा जिनिगी के सही डगर पावे खातिर सेवा करेवाला मन बनावल एगो तप आ पुन्य जइसन काम ह. ई कउनो जरुरी नइखे कि केहू के लगे धन के कमी बा त सेवा ना हो सकेला. आदमी के तन मन में एगो उत्साह के दरकार सेवा बात खातिर जरुरी होला. सेवा में लागल मन के एगो दोसरे सुख मिलेला. जे केहू के कवनो ना कवनो रुप में मदद करेला ओकरा मदद खातिर हजार गो रास्ता खुल जाला. रउवा जदी मन में केहू के सेवा करेके ठान लेनीं त ई बूझीं कि राउर जिनिगी के एगो नीमन काम अपनहीं से शुरु हो गइल बा. अइसन कइला से रउवा मन के एगो अलगे किसिम के सुख त मिलबे करी साथे साथे धरम समाज आ संस्कृति के सेवा करेवाला जवन कर्तव्य होला उहो पूरा हो जाला.

एकरा अलावे ई बात साफ जान लेवे के जरुरत बा कि केहू के सेवा कइल तनिको बाँऽव ना जाला. साँच मन से कइल सेवा के फल रउवा कवनो ना कवनो तरीका से बढ़न्ती के रुप में जरुर मिल जाला.