गइलीं गाँव, गाँव से भगलीं

भगवती प्रसाद द्विवेदी

गाँव के नाँव लिहला पर आजकाल्ह नंदीग्राम अनसोहाते जबान पर आ जात बा. जहवाँ के किसानन के बेदखल कइके उन्हनीं के उपजाऊ जमीन औने पौने दाम में व्यवसायिक इस्तेमाल खातिर सरकारी स्तर पर हड़पल जा रहल बा आ विरोध कइला पर बेमउअत मुआवे के सिलसिला जारी बा. ई त भइल नंदीग्राम के बात. आज सउँसे दुनिया विश्वग्राम बन गइल बा. बाकिर एह विश्वग्राम में हमनी के आपन गाँव कहाँ बा? पुण्य श्लोक बन्धुवर कैलाश गौतम जी हिन्दी में एगो कविता लिखले रहनीं‍-"गाँव गया था,गाँव से भागा" का आजुओ पढ़ुवा लोगन के गाँव से भगावे के साजिश नइखे कइल जात?

जब पढ़ल- लिखल नवही रोजी-रोटी के फिराक में छिछियाए खातिर अलचार हो जालन,तबहूँ ओह लोग के दिल में गँवई इयाद के कीरा कुलबुलात रहेला,जवन बेर-बागर गाँवे जाए खातिर मजबूर कऽ देला.वाकिर अब ओइसन गँवई मनई कहवाँ बाड़न,जे जाते परदेसी बाबू के अँकवारी में बान्हिके नेह-छोह के सबूत पेश करसु.ऊ लोग त शहर में जाए वाला के जइसे अपना बिरदारी से कुजात छाँटि के अलगा कऽ देले होखे.खैर,जइसे-तइसे नोकरी-चाकरी में अपना जिनिगी के सोनहुला समय गँवा दिहला का बाद ओकरा के दूध के माछी नियर निकालिके बीगि दिहल जाला.ऊहो बेचारा सोचेला कि चलऽ हे मन!अब गाँवे चलिके बुढरी के दिन चैन से काटऽ|

बाकिर गाँवें जात कहीं कि चैन नदारद!अब उन्हुकर नाँव धरा जाई-शहरी बाबू!अइसन कुचक्र सचल जाई कि उन्हुकर जीयल हराम हो जाऊ.भाई-भउजाई,गोतिया-देयाद सभ-के-सभ मुहँ फुला ली.अच्छा!त आ गइले हिस्सा-बखरा लेबे!केहू अपना घरके नाली उन्हुका दुआरि॓ए प बहावे लागी,त केहू मए कूडा़-करकट उन्हुके अँगना भा दुआर पर फेंके लागी.खेत के डँडा़र तूरिके उन्हुकर जमीन आस्ते-आस्ते दखलियावल जा॓ए लागी.मुँह में अँगुरी डालिके बोलवावे के सरंजाम.बन के गीदड़ आखिर जइहे केने?अउर ना,त किछु ममिला-मोकदिमा में फँसा दिहल जाई.फेरु.या त ऊ थाना-पुलिस,कोट-कचहरी में चक्कर लगावत अझुराइल रहसु भा मए सम्पत्ति कउड़ी के मोल बेचि-बाचिके फेरु शहर का ओरि भागि जासु.

का भोला-भाला,निश्छल गँवई लोग अतना बदलि गइल?थोरहीं में निबाह करेवाला लोगन में रसरी के अँइठन नियर घुरचियाहपन आ पैंतराबाजी कहवाँ से आ गइल?जब से गाँवन में मुखियागिरी/परधानी खातिर गरदन कटउवल आ सियासती दाँवपेंच इस्तेमाल होखे लागल,सजगता के नाँव पर ठगी,धूर्तई आ लफँगई के बोलबाला हो गइल आ सोझ-साफ आउर ईमानदार लोगन के जीयल मोहाल हो गइल.का थाना,का ब्लॉक,का कचहरी,का पंचाइत-हर,जगहा दलालन के तूती बोले लागल आ सीधा-सच्चा लोगन के बोलती बन्द होखे लागल.

कतहीं जातिवाद के जहर-माहुर त कतहीं भाई-भतीजावाद आ बिरादरीवाद के बिखिधर. लुच्चा-लफंगा आ सङक छाप लोग कर्णधार बनिके लूट-खसोट में लिप्त हो गइल.ओने सरकारी महकमा के अफसर-बाबू-दलाल चानी काटे लगलन स. चकबंदी के नाँव पर गरीब-गुरबा आ साँच-साफ लोगन के अपना खेत-बारी से बेदखल कइल जाए लागल.

गाँव,जवन कबो सरग मानल जात रहे,अब कई तरह के राजनीति-कूटनीति-दुनीति में आकँठ डूबल नरक के पर्याय बनल जा रहल बा. उहँवा अब खाली अपना मतलब से मतलब रहि गइल बा. ना केहू के सुख-दुख से कवनो हमदर्दी,ना हितई-नतई,भर-भवद॓दी,दोस्ती-इयारी के पहिलेवाला प्रगाढ़ नेह-नाता.सवारथ सभकरा कपारे चढ़िके बोल रहल बा आ सभ केहू धन आ निसा के मद में डोल रहल बा.

हालाँकि देश के अधिकतर योजना गाँवे के विकास,शिक्षा,सेहत खातिर बाडी़ स,बाकिर ई अइसने लोगन के बानरबाँट में ऊँट के मुँह में जीरा नियर टाँय-टाँय-फिस्स होके रहि जात बाडी़ स.

जब लोकजिनिगी से लोके नदारद हो जाई,जब गाँव में,लोकधुन,हुलास,उछाह,भाईचारा आ प्रमभाव के लोप हो जाई,त फेरु गाँव में रहिए का जाई!जहवाँ लूट-खसोट,रुढि़वादिता,अंधविश्वास,आड़म्बर,सियासी छल-छद्म ओ अभावरग्स्तता के वैतरणी बहत होखे,उहवाँ पँवरे ना जानेवाला आ पार ना पावेवाला अनजान मनई के त गाँव छोड़हीं के परी.फेरु त लवटिके बुध्दू जब वापिस शहर में अइहन,त उन्हुकरा कहहीं के परी-"गइलीं गाँव,गाँव से भगलीं" जब बेटा के नइहर ह गाँव आ शहर-शहरात ह ससुरा,त आखिरकार नइहर से रोवत-बिलिखत ससुरा आवहीं के परी नू?